24.9.11

रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ...


गज़ल लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। यह विधा मुझे बहुत कठिन लगती है। कभी कभार हिमाकत कर बैठता हूँ। गलतियाँ बतायेंगे तो सुधारने का प्रयास करूंगा। सुधार देंगे तो और भी अच्छी बात हो जायेगी।


गुजरे हैं फिर करीब से वो उठा के हाथ
करते थे बात देर तक जो मिला के हाथ

वादे पे उनके हमको इतना यकीन था
करते थे याद नींद में हम हिला के हाथ

उठ जाये ना भूल से फिर उनको देखकर
रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ

मिल जायेगा अगर कहीं पहुँचा हुआ फकीर
पूछेंगे इसका राज तब हम दिखा के हाथ

करता हूँ अब तो दूर से सबको मैं सलाम
जब से गई है जिंदगी मुझसे छुड़ा के हाथ

...........................

40 comments:

  1. बाप रे बहुत तगड़ा दाग दिय हो ..कहीं से कोई नुक्स नहीं लाजवाब है !

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  2. हुजूर, जेब से हाथ बाहर निकालिये और ऐसी गज़लें कागज पर उतारिये।

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  3. वादे पे उनके हमको इतना यकीन था
    करते थे याद नींद में हम हिला के हाथ

    उठ जाये ना भूल से फिर उनको देखकर
    रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ

    बहुत खूब ..प्रवीण जी सलाह पर ध्यान दीजिए

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  4. करता हूँ अब तो दूर से सबको मैं सलाम
    जब से गई है जिंदगी मुझसे छुड़ा के हाथ
    इस ग़ज़ल के लिए एक शब्द है .. लाजवाब!!

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  5. पोस्ट मा आप इजाजत दिहे अहैं, यहिलिये हम आपै के भावन कै यक दूसर ड्राफ्ट आपके सामने रखत अहन, बतायौ भइया कि केस लागत बाटै:

    “ गुजरे हैं फिर करीब से वो हाथ उठा के,
    करते थे देर तक जो बात हाथ मिला के।

    वादे पे उनके हमको बहोत ऐतबार था,
    करते थे याद नींद में भी हाथ हिला के।

    उठ जाए न भूले से कभी देख के उनको,
    रखता हूँ अपनी जेब में अब हाथ छुपा के।

    मिल जायगा अगर कहीं पहुँचा हुआ फकीर,
    पूछेंगे इसके राज अपन हाथ दिखा के।

    करता हूँ तबसे,दूर से सबको सलाम मैं,
    जीवन हुआ बेगाना, जबसे हाथ छुड़ा के।

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  6. देवेन्द्र भाई ,
    मज़ा आ गया आज आपकी ग़ज़ल पढ़ के, बेहतरीन भाव ....कृपया लिखते रहें ! बेहतरीन शायर और लेख़क क्लास में नहीं सीखते, जो दिल से निकले वही ग़ज़ल है !

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  7. अमरेन्द्र भाई....

    आपो किये हैं मिहनत गज़ब दिल लगा के
    देखें का कहत हैं फनकार अब हाथ उठा के

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  8. @जब से गई है जिंदगी मुझसे छुड़ा के हाथ

    मज़ा आ गया. शानदार ग़ज़ल और ज़बर्दस्त प्रत्युत्तर! इसी को कहते हैं डबल मज़ा!

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  9. जिंदगी को समझाने कि कोशिश. सुंदर रचना.

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  10. सम्पूर्ण ग़ज़ल ।

    उठ जाये ना भूल से फिर उनको देखकर
    रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ

    बेहतरीन।

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  11. वाह, क्या बात है!! खूबसूरत ग़ज़ल!

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  12. अच्छा लिखे हैं ,और भी लिखिये ।

    स्वागत करेंगे आपका , हम बढ़ा के हाथ।

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  13. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 26-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  14. उठ जाये ना भूल से फिर उनको देखकर
    रखता हूँ अपनी जेब में अब छुपा के हाथ

    रोमांचित कर देने वाला शेर......

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  15. आख़िरी शेर कमाल का है.

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  16. प्रस्तुति स्तुतनीय है, भावों को परनाम |
    मातु शारदे की कृपा, बनी रहे अविराम ||

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  17. करता हूँ अब तो दूर से सबको मैं सलाम
    जब से गई है जिंदगी मुझसे छुड़ा के हाथ

    bahut khoob.

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  18. सुन्दर,और भी लिखिये.
    मगर गजल की एक बात मेरी समझ मे नहीं आती कि सुरु मे एक भाव होता है,और दूसरी लाइनों मे कुछ और होता है.मगर आपकी गजल मे सुरु से अन्त तक एक ही भाव है,जो मुझे बहुत अछ्छा लगा.

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  19. चौचक है हर शेर .

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  20. वाह क्या कहने, लाजवाब.

    रामराम

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  21. बढ़िया है,जारी रखें..

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  22. ऐसी हिमाकत कभी कभार नहीं, बारंबार करते रहिये।

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  23. क्या बात है, देवेन्द्र जी .
    नया अंदाज़ बढ़िया लगा.

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  24. कमाल कै ग़ज़ल कहि दिहे हैं आप !!

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  25. वादे पे उनके हमको इतना यकीन था
    करते थे याद नींद में हम हिला के हाथ... bahut khoob

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  26. देव बाबू क्या बात है इतनी शानदार तो ग़ज़ल कही है आपने.......इसमें सुधार की गुंजाइश कहाँ है मुकम्मल ग़ज़ल है ...........वाह ...दाद कबूल करें|

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  27. बहुत अच्छी ग़ज़ल....
    सादर...

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  28. बहुत अच्छी ग़ज़ल.... शुभकामना..

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  29. आपकी लेखनी जिस विधा को छू भर दे वो बेमिसाल हो जाता है.

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  30. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  31. गुजरे हैं फिर करीब से वो उठा के हाथ
    करते थे बात देर तक जो मिला के हाथ

    क्या बात है देवेन्द्र जी. मज़ा आ गया. शानदार ग़ज़ल है भाई. इस शेर को अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर डाल रही हूं, बिना पूछे :)

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  32. बहुत अच्छी ग़ज़ल|
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं|

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  33. बहुत ही सुन्दर भाव भर दिए हैं पोस्ट में........शानदार| नवरात्रि पर्व की शुभकामनाएं.

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  34. करता हूँ अब तो दूर से सबको मैं सलाम
    जब से गई है जिंदगी मुझसे छुड़ा के हाथ

    निराश होने की जरूरत नही है । वो जिंदगी फिर वापस आकर आपका हाथ पकड़ लेगी,जाएगी कहाँ । बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद ।

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  35. मिल जायेगा अगर कहीं पहुँचा हुआ फकीर
    पूछेंगे इसका राज तब हम दिखा के हाथ

    जो सुधार किया है उससे original वाला ही ठीक है ..............सबसे अच्छा जो लगा वो हमने अपने कमेन्ट में सुरक्षित किया है

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  36. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! हर एक शब्द लाजवाब है! शानदार प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार को नवरात्रि पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

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  37. गज़ब रच गये भाई...और लाओ...निकालो जेब से हाथ.

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  38. .... बढ़िया अंदाज़ ...देवेन्द्र जी

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