12.10.12

फेसबुक में विवाह

फेसबुक में विवाह शब्द पर आराधना 'मुक्ति' जी ने अच्छा विमर्श उठाया है। अपने से बात शुरू करके उन्होने -क्या लड़कियों को विवाह करना चाहिए? विवाह यदि समझौता हो तो फिर इस समझौते में स्त्री को अपनी सुरक्षा के बदले में क्या कीमत चुकानी पड़ती है? जैसे गंभीर विमर्श की शुरूआत की है। आगे एक प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट किया है कि मेरा मंतव्य अपने विवाह के विषय में रखने का नहीं था, मेरा उद्देश्य उस मानसिकता को सामने रखना था, जिसके तहत लड़कियों की शादी भी एक 'करियर ऑप्शन' समझ ली जाती है. वहाँ आये कुछ अच्छे कमेंट्स को यहाँ कट-पेस्ट कर रहा हूँ, अपनी याददाश्त के लिये। वैसे ही जैसे कभी कुछ अच्छा पढ़कर डायरी के पन्नों पर लिख लिया करता था। :) 

आराधना जी ने यह लिखकर विमर्श की शुरूआत की......

कल एक ब्लॉगर और फेसबुकीय मित्र ने मुझे यह सलाह दी कि मैं शादी कर लूँ, तो मेरी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा. तब से मैं इस समझौते में स्त्रियों द्वारा 'सुरक्षा' के लिए चुकाई जाने वाली कीमत के विषय में विचार-विमर्श कर रही हूँ और पुरुषों के पास ऐसा कोई सोल्यूशन न होने की मजबूरियों के विषय में भी :)

विनीत कुमार....

शादी तभी कीजिएगा जब भीतर से महसूस करें..बाकी सुरक्षा,सहयोग सब बकवास है..जो सलाह दे रहे हैं वो आपकी काबिलियत पर  यकीन नहीं करते और ऐसी सलाह देना घिनौनी हरकत है..हां कई बार हम इमोशनल क्राइसिस में होते हैं तो जरुर लगता है कोई साथ हो जिससे सब शेयर कर सकें लेकिन जरुरी नहीं कि वो शादी के बाद मिल ही जाए..खुद से जमकर प्यार कीजिए...


काजल कुमार ........

विवाह institution का संबंध केवल आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा इत्‍यादि मात्र से ही नहीं है अपि‍तु इससे भी कहीं आगे, भावनात्‍मक संबंधों से भी है और स्‍त्री व पुरूष दोनों ही इससे समान रूप से संबद्ध हैं


शिवेंद्र पाण्डेय.

वह फेसबुकिया मित्र जरुर प्रित्सत्ता का ध्वजवाहक रहे होगे जो हमेसा यह मान कर चलते हे की "बगेर शादी के रिश्ते के ओरत का कोई सामाजिक बजूद नहीं हे "


शेखर सुमन...


सामजिक और आर्थिक सुरक्षा का तो पता नहीं लेकिन मानसिक तौर पर ज़रूर एक हमसफ़र की ज़रुरत होती है... विवाह सबका अपना एक निजी निर्णय होता है सिर्फ और सिर्फ उस कारण से विवाह कर लेना कि भाई हमें उसकी ज़रुरत(चाहे जैसी भी हो) पड़ेगी कहीं से भी उचित नहीं है लेकिन अगर किसी के पास एक हमसफ़र के रूप में कोई हो तो ना करने का कोई कारण नहीं है...विवाह का अस्तित्व अनिवार्यता और ज़रुरत से परे ही देखा जाना चाहिए.... सिर्फ ज़रूरतों को पूरा किये जाने के लिए विवाह नहीं किये जाते...


आराधना जी ने आगे लिखा....


वो समय भी पुराना हो गया है, जब बुढ़ापे के सहारे के लिए लोग शादी करते थे. आज एक तरह से देखा जाय, तो कोई अकेला नहीं और दूसरी दृष्टि से सभी अकेले हैं. बहुत से लोग शादी करके भी अकेले ही होते हैं. मेरे पिताजी ने तो शादी की थी ना, अम्मा के देहांत और हमलोगों की पढ़ाई की वजह से बुढ़ापे में अकेले रहे, जबकि उस समय हमारी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी frown


शिवम मिश्रा.....


शादी कर के भी जो अकेले हो जाते है उनका क्या ??? ज़िन्दगी हर रूप दिखा देती है ... पिछले 3 सालों मे अपनी 3 मामी और एक मौसा को अकेला होते देखा है ... बहुत से ऐसे भी लोगो को जानता हूँ जो शादी कर के भी अकेले है क्यूँ कि साथी से नहीं निभती ...


सतीश पंचम .........


विवाह कर लेने में बुराई ही क्या है, जरूरी तो नहीं कि एकला चलो कहते हुए क्रांतिरथ खदेड़ा जाय. विवाह में अहम चीज भावनात्मक लगाव है, सामाजिक और आर्थिक आदि अलग मुद्दे हैं. btw, यदि विवाह न करने का मन हो तो न किजिए लेकिन आपके अविवाहित रहने से शादी का खाना न खा पाने से जो हमारा एक टाईम की पेटपूजा का नुकसान होगा उसकी कुछ भरपाई किजिए smile....ब्याह करने वाले तो उसी वक्त क्रांतिकारी हो जाते हैं जब वे मांग में सिंदूर भरते हैं, इधर सिंदूरदान किया नहीं कि क्रांतिकारी का तमगा मिला....चल बेटा लग जा नून तेल लकड़ी के चक्कर में .....आजकल नून तेल लकड़ी की बजाय नून तेल सिलिंडर कहना चाहिये smile....वैसे मुझे कुछ दिलचस्प खयाल आ रहे हैं. भगवान जी लोग भी विवाह करते ही थे, राम जी को देखिये, शंकर जी को देखिये, हनुमान जी को छोड़िये, वे तो भगवान युग के अन्ना हजारे थे, नारद जी को भी छोड़िये वे तो अपने युग के स्वामी अग्निवेश थे, इधर की बात उधर लगाते थे, और कौन बचा, हां रावण, उसने भी विवाह किया था, मंदोदरी ने उसे कंट्रोल में रखा था, सोचिये रावण यदि अविवाहित रहता तो अनकंट्रोल्ड रावण कितना खतरनाक होता smile

वंदना अवस्थी.......

शादी अगर केवल आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के मद्देनज़र की जाए, समझौता ही है. वैसे देखा जाए, तो शादी एक समझौता ही तो है, सरोकार कुछ भी हों....इस मसले पर मुझे हमेशा कमला दास की आत्मकथा की ये पंक्तियाँ याद आती हैं-विवाह एक सामाजिक समझौता है, जो बहुत खूबसूरत भी हो सकता है.

आराधना जी ने फिर लिखा है...


हम चाहे जितना कहें कि विवाहितों और अविवाहितों में किसी को कमतर नहीं समझना चाहिए, लेकिन हमारे समाज में आज भी अविवाहित स्त्रियाँ कमतर ही समझी जाती हैं. बिना उनके निर्णय के मंतव्य और पृष्ठ्भूमि को जाने लोग अपने आप कयास लगा लेते हैं कि 'बंदी ज़रूर बहुत स्वच्छंद प्रवृत्ति की होगी' या 'बेचारी में कोई कमी होगी' या 'किसी ने प्यार में धोखा दिया होगा' और ऐसी ही तमाम बातें.


दीपक शुक्ला.......


'शादी''..वह लड्डू, जिसने खाया वह भी पछताया, जिसने नहीं खाया वह भी पछताया... तो खाकर पछताना ज्यादा श्रेयस्कर है मेरे विचार से...क्या पता ना ही पछताना पडे...मेरी तरह....smile..


इंदु बाला सिंह....


विवाह शब्द इतना भयावह हो चला है आज कि लोग बिना विवाह के साथ रहने को रहना पसंद करने लगे हैं .जब तक मन करे साथ चलो फिर उठ कर चल दो ...यह हमारी मानसिक कमजोरी दर्शाता है.वैसे विवाह परिवार को चलाने के लिये किया जाता है ....सुख और सुरक्षा तो खुद कमानी पड़ती है व्यक्ति को ...


प्रमोज तांबट...


बात विवाह की नहीं उस मानसिकता की है जिसने अंधिकांश महिलाओं को अवसरवादी और स्‍वार्थी बना कर रख दिया है। इसमें उन्‍हें दोयम दर्जे का नागरिक माने जाने की बीमार मानसिकता भी शामिल है।


डा0 अरविंद मिश्र.......


It is women's busshnes to get married as soon as possible and a man's to keep it away as long as he can" -a western thought which I find equally hold good for we orientals...........there are solid socio-biological groumds which support this argument. उन्होने इस विषय में एक पोस्ट लिखने का वादा भी किया है.... As soon as I get a little breathing space I would write a post on it on my blog and explain why marraige is more important to women than men and in turn beneficial to survival of our species..

अलका भारतीय.....

विवाहा एक संस्था हैं और जो दो लोगो की भागीदारी से बनती हैं इसमें दोनों हि भगीदार भी बराबर के महत्वपूर्ण हैं दोनों भागीदारी भी इस लिये किसी एक व्यक्ति के लिये अधिक जरुरी या कम जरुरी जैसा नहीं क्योंकि कोई भी संस्था जो दो लोगो की भागी दारी के बिना नहीं चल सकती उसमे वोह दो लोग जो अपनी स्वेक्षा एक दूसरे का साथ चुनते हैं संस्था की स्थापना के लिये वहाँ दोनों के लिये हि व्यक्तिगत आधार पर सामना रुप से "महत्व"एक टूल तरह हो जाता हैं एक लिये भी येह महत्व कम हुआ तो संस्था की स्थापना संभव नहीं हैं।.....

आजकल तो पति पत्नी काम करते हैं इसमें कोई परेशनी भी नहीं असल भारत जहँ बसता हैं गावो मे जहँ पत्नी खेतों मे काम करती हैं और घर एके भी गर आपने पुरुष पति से कुछ मदद की आशा रखती हैं तो तुरंत हि पति का पुरुषत्व जाग जाता हैं जबकि जब वोह खेतों एम् उसके बर्बर काम कर रही होती हैं तो पुरुष का पुरुषत्व कहाँ होत आहें जब उससे वोह मदद ले रहा होता हैं यही दोहरी नीतिया समाज को विकृत करती जा रही हैं।........अर्थ एक शक्ति हैं लेकिन खाली आर्थिक रुप से संपन्न हो जाने मात्र से इस दोहरे मापदंडो की समस्य ख्तम होएं वाली नहीं येह समस्या तभी समाप्त होगी जब औरत बदलेगी।......औरत यानि पति की माँ भी औरत यानि पत्नी की माँ भी आने वाली पीढ़ी की माँ भी......जब तक औरत को भूमि की तरह इस्तेमाल करने के लिये उस पर मालिकाना हक रखने के रुप मे विवाह जैसे संस्कार को देखा जायेगा इस समाज के द्वारा तब तक कुछ बदलने वाला नहीं।

हेमा दिक्षित..............

भविष्य दृष्टा की तरह देखने पर मुझे लगता है कि आने वाले समय में जब स्त्रियाँ आर्थिक रूप से बेहद सुदृढ़ होंगी और समाज में एक सुरक्षित एवं संतुलित मुकाम पर होंगी तो निश्चित रूप से ' पुरुष पत्नियाँ ' भी चलन में आ ही जायेंगी ... और एक बार इस कल्पना मे मुझे कोई बुराई नहीं दिखती कि ' तथाकथित कल्पित पुरुष पत्नियाँ ' वर्तमान की स्त्रियों की भाँति उन सभी घरेलू कार्यों में हाँफते एवं पसीना पोंछते हुए व्यस्त है बिलकुल एक कार्य कुशल ,गृह कार्य दक्ष ,सुन्दर सुघड़ अर्धांगिनी की तरह ... मसलन कपडे धोते ,सुखाते ,तहाते हुए या या सुबह सबेरे बच्चो का टिफिन बनाते हुए आदि-अनादि ... सुखद कल्पना है कि एक घर में अल्ल सबेरे एक स्त्री मौज से अपनी इच्छा पर बिस्तर छोडती है और दरवाजे या बालकनी में पड़ा अखबार उठा क्रर एक कुर्सी पर अपने मालिकाने के साथ विराजती है और उसकी खिदमत में एक प्याला गर्म चाय पेश की जाती है ... :)))) ख्याल तो अच्छा है ना जी ...

इस विषय पर मैने भी लिखा था..

मेरे विचार से विवाह करना इसलिए आवश्यक है कि बिना विवाह के गृहस्थ आश्रम का स्वाद नहीं चखा जा सकता। बिना गृहस्थ हुए पुरूष या स्त्री अपना स्व पूर्ण रूप से नहीं जी सकते। अपने होने का अर्थ नहीं जान पाते। रिश्तों की गहराई, प्रेम, रूसवाई, सबकुछ देखने और समझने के बाद भी लगता है अभी जीवन पूरा नहीं जीया तो फिर बिना विवाह के हमने जीवन जी लिया यह कैसे कह सकते हैं? सुख को तराजू पर रखकर तौलना ही विवाह करने या न करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।

मुझे यह विमर्श अच्छा लगा। यहाँ संकलित कर दिया। इसमें बहुत से कमेंट्स न हिंदी में लिखे गये हैं न इंगलिश में। हिंगलिश में लिखे कमेंट मुझे हिंगलिश में लिखे होने के कारण अच्छे नहीं लगते। वैसे बात उसमें भी जोरदार थी। और भी बहुत से कमेंट्स थे जिन्हें पढ़ने के लिए आपको वहीं जाना पड़ेगा। यह तो मैने फेसबुकिया ब्लॉगिंग का आनंद लिया है। आप भी पढ़ें और आनंद लें। कुछ जोड़ना चाहते हों तो जोड़ें। आराधना जी से कुछ पूछना चाहते हों तो फेसबुक में उनके दिये लिंक पर जा सकते हैं।:)

धन्यवाद।

इस विमर्श में दो और ब्लॉग हाथ लगे । इनके लिंक्स भी जोड़ रहा हूँ...

लिंक-1 

लिंक-2

22 comments:

  1. बहुत ख़ूब वाह!

    आपकी नज़रे-इनायत इसपर भी हो-

    रात का सूनापन अपना था

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  2. अच्छा विवाह-सूत्र संकलन है।

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  3. सहजीवन बिना समाज में निर्वाह नहीं, उसे कुछ ऐसा स्वरूप मिले जिससे उसमें स्थायित्व रहे। इसे विवाह का नाम दिया गया है। हर संबंधों की तरह इसमें भी समस्यायें होती हैं, उन्हें सुलझाना हो, वही उचित है।

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  4. हाँ, वहाँ पर विवाह के विषय में आये बहुत से कमेन्ट एक अच्छा संकलन है कि भिन्न-भिन्न लोग विवाह के विषय में क्या सोचते हैं? मेरा भी यही कहना है कि विवाह का अर्थ है- साथ रहने और प्यार को महसूस करने की इच्छा की सामाजिक स्वीकृत. विवाह लड़कियों के लिए इसलिए आवश्यक नहीं होना चाहिए कि उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित होती है और लड़कों के लिए इसलिए ज़रूरी नहीं कि उनके लिए खाना बनाने और घर संभालने वाली मिल जायेगी. विवाह का आधार प्रेम होना चाहिए, चाहे वो अपनी मर्ज़ी से विवाह के पूर्व हुआ हो या माँ-बाप की मर्ज़ी से विवाह करने के बाद धीरे-धीरे हो...शेष सभी बातें विवाह की आवश्यक शर्त नहीं हैं, हाँ उससे अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी ज़रूर हैं.

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    1. मैने आपका मंतव्य शुरू में ही ज्यों का त्यों लिख दिया है। प्रेम और विश्वास ही विवाह को संबल प्रदान करते हैं। हकीकत यह भी है कि विवाहोपरांत वैवाहिक संबंधों पर अर्थ असरकारी प्रभाव दिखाना शुरू करता है। इसलिए आवश्यक है कि लड़कियाँ शिक्षित हों, अपने पैर पर खड़ी हों, पैसे के लिए पति पर आश्रित न हों। कालांतर में यदि किसी कारणवश प्रेम घटा। मानवीय लोभ और स्वार्थ हावी हुआ तो वे उसका मुकाबला कर सकें। पति से आर्थिक सुरक्षा की गारंटी लेने से अच्छा है, स्वयम सबल हों।

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    2. जहाँ प्रेम,विश्वास और ईमानदारी बरकरार है वहीं कोई भी संबंध टिका रह सकता है। जिस पल यह खत्म हुआ उसी समय से जंगल का कानूल लागू हो जाता है..जिसकी लाठी उसकी भैंस। फिर कोई भी किसी से कम नहीं है चाहे वह पुरूष हो या फिर स्त्री। वर्तमान में यह लाठी पुरूषों के पास होने के कारण स्त्रियों पर शोषण दिखाई देता है। प्रेम और आपसी विश्वास की नींव जब दरकने लगती है तो उसी पल विवाह की जरूरत अधिक महसूस होती है। क्योंकि यहाँ दो कुटुंब संबल बन खड़े होते हैं। दोनो मिलकर प्रयास करते हैं कि विवाहित जोड़े के मध्य जो शंकाएं उपजी हैं उसका समाधान कर दिया जाय। जरूरी नहीं कि दोनो मिलकर ईमानदार प्रयास ही करें, सफल ही हों लेकिन एक संभावना तो रहती ही है कि ये आपसी संबंधों को फिर से मजबूती प्रदान करेंगे।

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  5. विवाह समाज की आवश्यकता है .....एक सुव्यवस्था है....प्रेम और पारस्परिक विश्वास पर आधारित वह प्रासाद है जो स्त्री-पुरुष दोनों को सुरक्षा का वचन देता है। किंतु आज के परिवेश में पाण्डेय जी की बात अधिक व्यावहारिक है।

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  6. पता नहीं,मेरा तो सिर्फ यही कहना है- मैं जिंदगी का साथ निभाता यला गया।

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  7. @ इस प्रकार विवाह एक समझौता ही होगा.....


    बेशक विवाह सँस्था एक समझौता ही है. उभयपक्ष की पारस्परिक सुविधा व सहमति का समझौता. यहाँ सँघर्ष अथवा किसी एक की जीत के लिए कोई स्थान नही है. सारी समस्या ही इस पवित्र समझौते को मजबूरी के अर्थ मे समझौता मानने से है. स्वार्थी मानसिकता सदैव शोषण के सँदेह मे ही जीती है, स्वार्थ एक तरफा सुविधाएँ खोजता/चाहता है. अगर हम स्वार्थमय जीत की ही अपेक्षा करे तो निश्चित ही असफल होँगे. जिनकी मात्र अधिकारो पर काकदृष्टि जमी रहती है जबकि इस पावन समझौते मे केवल विश्वास और कर्तव्य के अनुबँध ही निश्चित है जिसका का ईमानदारी से पालन अनिवार्य है इस अनुबँध मेँ स्वार्थ के समर्थन मेँ कोई धारा नही है. जिन्हेँ समझौता शब्द मे ही हीनता का अहसास हो उनका जीवन निरंतर घर्षण मे ही व्यतीत होना निश्चित है.

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    1. माना जाता है कि यह समझौता है। समझाया जाता है कि यह पवित्र है। मन भी चाहता है कि इस पर विश्वास करें लेकिन दिल दहल जाता है जब हकीकत में देखने को मिलता है कि कदम-कदम पर इस समझौते के हर शर्तों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। इसकी पवित्रता पर भौतिकता की नज़र लग गई है सुज्ञ जी।

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  8. आराधना मुक्ति ने कैरियर की बात उठाई है,क्या शादी करने को कैरियर कहा जा सकता है ? मगर ये दुःख की बात है की लडकियों के साथ यैसा ही सोचा जाता है.

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    1. जी, मेरा मंतव्य इसी बात को आगे लाना था कि क्या लड़कियों के लिए विवाह भी एक कैरियर के रूप में माना जाना चाहिए? आज जबकि हम देख रहे हैं कि दहेज और घरेलू हिंसा जैसे कारणों से विवाह टूटते हैं, तो लड़कियाँ असहाय हो जाती हैं क्योंकि हम उन्हें इस ढंग से पालते हैं कि विवाह उनके लिए एक कैरियर की तरह होता है. यदि लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाया जाय और विवाह का आधार मात्र प्रेम रखा जाय, तो ये स्थिति न आये...
      पर अफ़सोस कि मेरे मंतव्य को कोई नहीं समझा. विवाह की अनिवार्यता और विवाह के स्वरूप पर चर्चा होने लगी. खैर, कोई बात नहीं.

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    2. पूर्णतया सहमत हूँ। विवाह को लड़कियों का कैरियर नहीं माना जाना चाहिए। आत्मनिर्भर बनाना, कैरियर बना चुकने के पश्चात सही साथी की तलाश में सहयोग प्रदान करना ही एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए। सुंदर प्रतिक्रिया के लिए प्रेम बल्लभ पाण्डेय जी का आभार।

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  9. धन्यवाद, आपके सौजन्य से ’फ़ेसबुक में विवाह’ देख पाये:)

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  10. अच्छा संकलन ताकि सनद रहे ...मैंने वो पोस्ट लिख भी डाली !

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  11. आराधना का वो स्टेटस जब देखा तब तक 70 कमेंट्स हो चुके थे,सोचा फुर्सत से पढूंगी,पर उतनी फुर्सत मिली नहीं।
    अच्छा है आपने कुछ टिप्पणियों को यहाँ संकलित किया।
    लोगो के अलग-अलग विचार जानने को मिले।

    शादी तो जरूर करनी चाहिए,पर किसी समझौते के तहत नहीं।
    पर अफ़सोस है,हमारे समाज में होता यही है।
    एक साथी (companion) के लिए शादी नहीं की जाती बल्कि इसलिए की जाती है या ये कहना ठीक होगा कि माता-पिता द्वारा कर दी जाती है कि पति धनोपार्जन करेगा और पत्नी घर और बच्चे संभालेगी।

    दोनों के मन में भी यही बात रहती है पति अक्सर खुद को पालक के रोल में ही देखता है। और पत्नी भी यही समझती है।
    दोनों एक साथी या दोस्त की तरह नहीं रहते।
    अब धीरे धीरे परिवर्तन हो रहा है पर बस महानगरों और बड़े शहरों में ही बाकी जगह अब भी यही स्थिति है।

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    1. सुज्ञ जी के विचार आपसे भिन्न हैं।

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  12. sorry - i do not have transliteration, so i am commenting in english, bcoz such a long roman comment seems unreadable :(

    i think, whether to enter into marriage or not is each individual's decision, not a social one. i don't think marriage is just for "aarthik suraksha" or "budhape ka saath". it is for love, family, kids, happiness, shared joys, shared sorrows, extended families like mom and daughters in law, and sons and fathers in law, and so on.... it is for day to day life, not for an unseen emergency. it is definitely NOT about being the boss of another humans life. there is a difference between "living" and "existing".

    but yes - if one DOES choose to enter this relation, then one has a moral binding to respect the conditions involved with it - being mutual caring, loyalty, and so on.

    we humans are neither animals nor devas. we are in between the two stages. we created this institution of marriage as the best option before us for the survival of our race with certain moral and ethical bindings and security, with our evolution.

    if this institution of marriage is not going to meet the moral / physical / social etc. needs of the human race, it will get dissolved in another million or so years in the process of evolution, the way our appendix has almost disappeared. and it is not going to happen in one day.

    i don't understand why so much hue and cry is needed about this. if a man / woman who is independent chooses not to marry - it is purely his / her own decision. on the same token, if one wants to marry, it is again their own decision. it is none of the samaj ke thekedar's business to interfere either way.

    today i read in the latest post at pittpat blog : swatantrata yadi thopi jaaye to daasatv ban jaatee hai...

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    1. नितांत व्यक्तिगत निर्णय है लेकिन यह समाज तो हाय तौबा मचायेगा ही। कोई शुभेच्छा से, कोई कलुषित मानसिकता से। समाज अभी व्यक्तिगत निर्णय की स्वतंत्रता देने की स्थिति में नहीं है। अभी तराजू के पलड़े बराबर नहीं हुए। आपने सही लिखा कि यह एक दिन में नहीं होगा इसके लिए लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

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  13. बढ़िया विमर्श । भई शादी वही लड्डू है जो खाए पछताए जो न खाए पछताए :-)

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  14. रचना जी ने इस विमर्श में इस लिंक को शामिल किया था जो गलती से डिलीट हो गया....

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/10/blog-post_14.html

    मैने यह लिंक पढ़ा। यहाँ भी लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया है। ये पंक्तियाँ अच्छी लगीं....

    हर स्त्री को आत्म निर्भर हो कर अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ करना आना चाहिये उसके बाद आप किस के साथ और कैसे इस रोटी को बाँट कर खाए ये आप पर निर्भर करेगा ।

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  15. अभी दो ब्लॉग लिंक पोस्ट के साथ जोड़ दिया हूँ। लिख दिया ताकि याद हो कब जोड़ा!:)

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