20.7.13

सांप और बांसुरी

इस ब्लॉग की कविताओं को फेसबुक में खूब साझा किया। कभी-कभी फेसबुक में स्टेटस लिखने का शौक भी दे देती हैं कविताएँ..। दो दिन पहले फेसबुक पर लिखी इस कविता को बहुत से मित्रों ने खूब पसंद किया तो सोचा चलो इसे ब्लॉग को समर्पित कर दें। 

सांप और बांसुरी

माँ कहती थीं..
'बारिश का मौसम है
सांप बहुत निकलते हैं
शाम के समय
बांसुरी मत बजाओ!'

मैं कहता था..
"सांप के 
कान नहीं होते।'

माँ कहती थीं..
'तुम ज्यादा जानते हो!
सांप के कान नहीं होते तो
कैसे नाचता
सपेरे की बीन पर
क्या वह
देख-देख कर मुड़ी हिलाता है?'

मैं कहता था..
'साँप के
आँख भी नहीं होते।'

माँ कहती थीं..
'मैने कह दिया ना
बस्स...
बांसुरी मत बजाओ!'
और मैं
रख देता था
ताखे पर
बांसुरी।

अब माँ नहीं हैं
बारिश का मौसम है
लेकिन मन भी
नहीं रह गया
चंदन-सा।

अब तो पढ़ता हूँ
आज
किसने
कितना जहर उगला!
............

26 comments:

  1. आज की बुलेटिन अकबर - बीरबल और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट (रचना) को भी शामिल किया गया। सादर .... आभार।।

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  2. उम्र के साथ वह मन बदल गया - और माँ भी नहीं जो पहलेवाला मन जगा दें ,
    अब समय का फेर जो दिखाए !

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  3. अब तो इंसान सांप से भी जहरीला हो गया है... माँ होती तो शायद वे भी यही कहती...

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  4. मन चंदन ह्रोने पर तो साँप भी जहर नहीं उगलते।

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  5. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [22.07.2013]
    चर्चामंच 1314 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  6. बजाओ बांसुरी -चन्दन विष व्यापत नहीं

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  7. ये अच्छा किया आपने..वरना हम इस खूबसूरत कविता को पढने से रह जाते..
    हमने फेसबुक पर इस कविता को नहीं पढ़ा....जाने कैसे नज़र में नहीं आई ये कविता!

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  8. जहाँ खुशी देखते हैं, साँप निकल आते हैं,
    आजकल वंशी बजाते डर जाता हूँ।

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  9. किसने कितना ज़हर उगला ... और आज तो मौसम का भी इंतज़ार नहीं ... सारा साल जहर निकलता है ...

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  10. आज तो जहर उगलते भी हैं और दूसरों को खिला भी देते हैं किसी न किसी रूप में .... गहन भाव लिए अच्छी रचना ।

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  11. जहर के सामान बदल गए हैं , तीव्रता वही है !

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  12. आज 22/07/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  13. आजकल सांप इंसानों के पास नही फ़टकते, सांप के काटे का इलाज संभव है पर आदमी के काटे का इलाज नही होता.

    रामराम.

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  14. फ़ौइस्बॊक पर भी पढ़ी थी..........बहुत ही शानदार लगी।

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  15. सचमुच अब तो यही सुनने देखने रह गया है । अच्छी कविता ।

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  16. आज का यथार्थ...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  17. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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