28.7.13

मूर्ख!


भेड़ो कें झुँड से
अलग कर दी गई बकरी
बकरियों के साथ
नहीं रह पाया भेड़
सियार बनने के प्रयास में
मारे गये कुत्ते
खरगोशों ने
दूर तक खदेड़ा
सफेद चूहों को
बिल्ली मारी गई
कुत्तों के चक्कर में।

शेर ने खाया
बस पेट भर
मौके का लाभ उठा
स्वाद के लिए
निरीह का खून पीते रहे
दूसरे जानवर।

जी नहीं पाया
सुकून से
जिसने स्वीकार नहीं किया
जंगल का कानून।

नहीं दिखते
बिच्छुओं से डंक खाते जाने
और...
माफ करते रहने वाले
साधू।

क्या आप फँसे हैं कभी
ऐसे जंगल में?
नहीं...!
ओह!
निःसंदेह आप
भाग्यशाली और
बुद्धिमान हैं।
.....................

18 comments:

  1. जी नहीं पाया
    सुकून से
    जिसने स्वीकार नहीं किया
    जंगल का कानून।
    aaj kee sachchai dikhati sundar abhivyakti .

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  2. achchhe tarike ke aaj ke smy ki tsveer khichi hai aapne is kavita me
    badhai
    rachana

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  3. जंगल का लोकतंत्र ऐसा ही है !!

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  4. इससे भी खराब देश का हाल देख रहे हैं। अच्‍छा कविता।

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  5. सटीक कथ्य है.

    रामराम.

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  6. वहीं है हम सबका मुकाम।

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  7. आपका सन्देश पाते ही कविता के अंदर अपनी भूमिका / हैसियत चीन्हने की कोशिश कर रहा हूं !

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    1. जी, यह कोई दूसरा नहीं बता सकता।

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  8. वाह ... क्या अंत दिया है रचना को ...
    बहुत ही लाजवाब व्यंग ... सटीक ... करारा ...

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  9. सही में, जंगल में ही है हर कोई

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  10. गजब है इस जंगल का कानून-
    जीने के लिए अपनाना होगा-
    गजब-

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ५ रुपये मे भरने का तो पता नहीं खाली हो जाता है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. जंगल का कानून किसी को नहीं बख्शता ………बहुत बढ़िया |

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  13. नहीं किसी का ग्रास बनेगें, हम अपने ही त्रास बनेंगे।

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  14. अच्छी कविता । इस जंगलराज से बचना ही बडे जीवट का काम है । कविता का शीर्षक कविता से साम्य करता नही लगता । सायद मेरी समझ में न आरहा हो ।

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    1. पहले 'मैं मूर्ख' लिखा था। बाद में 'मूर्ख' ही रहने दिया। कहना चाहता था कि जो भी इस जंगल राज से नहीं बच पाये वे सभी मूर्ख हैं। जो बच गये वे भाग्यशाली हैं या बुद्धिमान। 'बुद्धिमान' शब्द में यहाँ व्यंग्योक्ति है। शायद मैं सफल नहीं हुआ।

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